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केले का चोर (Banana Thief)
एक गाओं में दक्कन नाम का एक व्यक्ति रहता था | वह खाने का बहुत शौक़ीन था | लेकिन वह कोई काम काज नहीं करता था | इसलिए ओ खाना चोरी करने लगा | समोसा रेडी पर देखता कि जैसे ही समोसा खाने वाला इधर उधर देखे तो बस उनके प्लेट से समोसा चोरी करलेता था | बेचारो को समझ ही नहीं आता था कि समोसा प्लेट से गायब कैसे हुए | छोटे बच्चे जब स्कूल जाते थे तब उनके पीछे पीछे चलकर उनके बैग से लंच बॉक्स चुरा ले ता था | और तो और अंधे भिखारी के कठोरी से भी खाना चुरा कर खा लेता था |
उस गाओं में भुवि नाम का एक केले बेचने वाला हुआ करता था | ओ रोज़ केले के खेत वाले से केले खरीद कर लकड़ी के दोनों तरफ़ बाँध कर चला करता था | फिर मार्केट में केलो को बेचता था | एक दिन दक्कन को भुवि केले ले जाते हुए दिखा, ओ धीरे से उन केलो के गुच्छो के पीछे गया | और एक एक केले तोड़कर खाने लगा | छिलको को पीछे फ़ेंक ने लगा | ओ ऐसे ही पूरा गुच्छा खलिया और भुवि को शक न हो इसलिये दोनों तरफ़ पत्थर बाँध दिए | मार्केट पहुँच कर भुवि ने यह देखा तो वह हैरान होगया |
एक शख्स ने पूछा - 'क्यों भुवि तुम खाली गुच्छा लेकर आये हो ? तुम बहुत भोले हो, तुमसे यह धंदा नहीं होगा | जिसने तुम्हे यह केले बेचे हैं, उसीने तुम्हे यह धोखा दिया होगा |' भुवि को कुछ समझ नहीं आया |
ऐसे हर दिन दक्कन पेड़ के पीछे छिपता और जैसे ही भुवि केले लेकर आता तो वह पीछे से सारे केले खले ता था | और वहां पत्थर बाँध देता था |
एक दिन भुवि अपने पत्नी से - 'मेरे तो कुछ समझ में नहीं आरा है, रोज़ केले गायब होजाते हैं | मेरी बेवकूफी के वजह से घर में खाने के लाले पड़े हैं | अब मै यह धंदा नहीं करसकता | मै कल से कोई कूली का काम करलूँगा |'
यह सुनकर उसके बेटे टिंकू को बहुत बुरा लगा | उसकी पत्नी ने कहा - 'आप फिकर न करो जी, बेटा टिंकू कल तुम अपने पिता जी के साथ जाओ, ज़रा देखना कि हो क्या रहा है |' टिंकू - ठीक है | कहा |
अगले दिन टिंकू और भुवि बगीचे से केले खरीदे, चल कर आरहे थे, टिंकू - पिता जी आप आगे चलिए, मै पीछे पीछे आता हूं | भुवि आगे चलने लगा | इतने में पेड़ के पीछे छुपा दक्कन बाहर आकर केलो के पीछे चलने लगा | यह देखकर टिंकू हैरान होगया | दक्कन केले खा रहा था |
टिंकू - 'ओहो ! यह इसका किया धरा है | स्कूल में भी मेरे दोस्तों का लंच बॉक्स यही चुराता होगा | इसे सबक सिखाना ही होगा,' ऐसे सोचा | फिर ज़ोर से कहा पिताजी रुकिए आरहा हूं | यह सुनकर दक्कान वहां से भाग गया |
अगले दिन टिंकू गाओं के एक दम करीब वाले जंगल से एक ostrich (शुतुरमुर्ग) के अंडे को उठा कर लाया | जो पेड़ के पीछे दक्कन रोज़ छुपा करता था, टिंकू उसी पेड़ के पास उस अंडे को रखा | कुछ देर बाद दक्कन वहाँ आया | वह अंडे को देखकर चकित रह गया |
दक्कन - "ब.. ब.. ब.. बा… ! इतना बड़ा अंडा ! इसका ऑमलेट बनाया तो दो दो ऑमलेट रोज़ खा सकता हूं"
सोच कर उस अंडे को उठाकर खुशी से चलने लगा | थोड़ी ही दूर सामने उसे एक ostrich (शुतुरमुर्ग) नज़र आया, वह गुस्से से दक्कन को देख रही थी | दक्कन ने अंडे को देखा तो उसे समझ आगया | शुतुरमुर्ग उसकी तरफ़ भागने लगी | दक्कन - 'हे राम !' चिल्ला कर, उस अंडे को फ़ेंक कर तेज़ भागने लगा | शुतुरमुर्ग (ostrich) उसी के पीछे भागने लगी | भागते भागते भागते, दक्कन गाओं से बाहर निकल गया | फिर कभी उस गाओं में वापस नहीं आया | टिंकू को उसके माता पिता खुशी से शाबाशी दिए |
सीख - "चोरी करना और किसी दूसरे का हक़ मार को खाना यह बुरी आदत है |"
इससे आपको क्या सीख मिली है हमें बताईयेगा..
आपका बहुत बहुत धन्यवाद 🙏
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