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दिन और तारीख़ की ज़रूरत नहीं | जब हम अमर अंत की कहानी कहनेवाले हैं तब एक दिन और एक तारीख़ को पकड़कर क्यों चलें?
उसके घर में पिता थे, माँ थी और एक गुड़िया सी बहन थी |गुलाब सिंह सारे घर का दुलारा था |
एक दिन की बात है | वह बीमार पड़ा | माँ ने उसका खाना बिलकुल बंद कर दिया था | पर उसका बार-बार कुछ खाने को माँगना, छोटी बहन से ना सहा गया | वह चुपके से गुड़ और चने चुरा लाई और खिला दिए अपने भैया को | उसके बाद भैया का बुखार बढ़ गया पर वह तो खिला ही चुकी थी | अपने भाई के संतोष के लिए वह माँ-बाप का गुस्सा भी सहने को तैयार थी | पर भाई ने गुड़-चने की बात किसी को न बताई | धीरे-धीरे रोग उतर गया पर भाई के मन पर बहन के प्रेम की छाप पड़ गई |
ऐसी एक नहीं, अनेक बातें - बहन की, माँ की, पिता की, उसके मन पर छपीं थीं | वह कभी उनसे लड़ता-झगड़ता भी, पर आँखों के आंसू और मन के रंग, उसके मन पर छपी इन तस्वीरों को धो न सके |
एक दिन ऐसी हवा बही की मुरझाए हुए दिलों में नई जान आ गई | यह हवा उमंगों की हवा थी | बड़ा भारी जुलूस निकलना था | पर बादशाह का हुक्म था कि जुलूस न निकले | शहर में आतंक छा गया |
"बड़ा आया बादशाह ! क्यों न निकले जुलूस ? क्यों न निकले हमारा झंडा !" भाई ने बहन से कहा |
बहन बोली, "कौन है यह बादशाह ? "
भैया ने कहा, "ऊँह, होगा कोई !"
बहन ने पूछा, "क्यों न निकले जुलूस ? क्यों न निकले झंडा ? "
भाई कटु स्वर में बिला, "हमारा देश बादशाह का गुलाम जो है |"
उत्तर था - तब तो ज़रूर निकले जुलूस ! हम ज़रूर फहराएँगे अपना झंडा ! देखते हैं कौन रोकता है हमें !
झंडे की तैयारी होने लगी | बहन ने अपनी पुरानी ओढ़नी फाड़कर झंडा बना लिया | लाल-हरा रंग भी चढ़ गया | भाई ने उसे अपने खेलने के डंडे से बांध लिया | झंडा तैयार था |
अब भाई झंडा लेकर चला | "अरे भाई ! जाते कहाँ हो ? हम भी साथ चलेंगे, " बहन आग्रह से बोली |
"पर बहन, बड़ी दूर जाना है | तुम थक जाओगी |"
"नहीं भैया !"
"नहीं बहन !"
"जुलूस कौन बनाएगा ? तुम झंडा उठाना, हम जुलूस बनाकर चलेंगे पीछे-पीछे |"
"नहीं रानी, तुम जुलूस नहीं..., तुम एक काम करो | हमें रोली का तिलक लगाकर विदा करो जैसे राजकुमारी अपने भाई राजकुमार को विदा करती है |"
बहन ने खुशी की किलकारी के साथ ताली बजाई और दौड़कर, थोड़ी सी रोली, थोड़े से चावल सजा लायी | थाली में एक दिया भी जल रहा था | भाई की आरती उतारनी थी | मुँह के चारों तरफ़ घूमती थाली एक आभामंडल बनाने लगी | उसने देवी-देवताओं के चित्रों में भी वैसा ही आभामंडल देखा था | भाई के चारों तरफ़ वैसा ही आभामंडल देखकर वह बहुत खुश हुई |
बहन ने भाई के माथे पर तिलक लगाया, चावल बिखराए | तब भाई ने बहन के पैर छुए और विदा ली | बहन ने भाई के सिर पर हाथ फेरा और बलैयाँ लीं |
अब वह झंडा लेकर चला | बहन दरवाज़े पर खड़ी देखती रह गई | कहानियों की राजकुमारी इसी तरह विदा देती है | वह झंडे को लहराते हुए ले जाते भाई को दूर तक देखती रही |
कुछ दूर जाने पर बादशाह के सिपाहियों ने झंडेवाले को रोका वह न रुका | बादशाह के सिपहियों ने गोली चला दी | वह गिरा | झंडा न गिरा | वह उसके हाथ में था | गोली चलते देख कोई उसके पास न आया | बहन ने भाई को गिरते देखा, वह दौड़ पड़ी | भाई खून से लथपथ पड़ा था | वह पुकारती रही, "भैया ! भैया !"
भाई के प्राण मानो यह अमृतवाणी सुनकर लौट पड़े | वह बोला, "तू आ गई, यह झंडा ले |"
बहन ने झंडा थाम लिया | भाई चला गया | बहुत रोई, पर झंडा हाथ में उठाए रही | बादशाह के सिपाही मानों गढ़ जीत कर चले गए | लोग भागे आए | उन्होंने भाई की देह उठाई | आगे-आगे झंडा लिए बहन चलने लगी |
बादशाह का हुक्म था - 'जुलूस नहीं निकलेगा' | जुलूस निकला | 'झंडा नहीं निकलेगा' | झंडा निकला और बड़ी शान से निकला |
यह बालक था - गुलाब सिंह जो अपनी सुगंध बिखेरकर चला गया |
Conclusion : इस कहानी के द्वारा देशभक्ति, त्याग, बलिदान, भाई-बहन का प्रेम, प्रजा की ज़िम्मेदारियाँ, कर्तव्य आदि का चित्रण किया गया है | इस कहानी में 'झंडा' स्वतंत्रता के संकेत के रूप में दिखाया गया है |
उसके घर में पिता थे, माँ थी और एक गुड़िया सी बहन थी |गुलाब सिंह सारे घर का दुलारा था |
एक दिन की बात है | वह बीमार पड़ा | माँ ने उसका खाना बिलकुल बंद कर दिया था | पर उसका बार-बार कुछ खाने को माँगना, छोटी बहन से ना सहा गया | वह चुपके से गुड़ और चने चुरा लाई और खिला दिए अपने भैया को | उसके बाद भैया का बुखार बढ़ गया पर वह तो खिला ही चुकी थी | अपने भाई के संतोष के लिए वह माँ-बाप का गुस्सा भी सहने को तैयार थी | पर भाई ने गुड़-चने की बात किसी को न बताई | धीरे-धीरे रोग उतर गया पर भाई के मन पर बहन के प्रेम की छाप पड़ गई |
ऐसी एक नहीं, अनेक बातें - बहन की, माँ की, पिता की, उसके मन पर छपीं थीं | वह कभी उनसे लड़ता-झगड़ता भी, पर आँखों के आंसू और मन के रंग, उसके मन पर छपी इन तस्वीरों को धो न सके |
एक दिन ऐसी हवा बही की मुरझाए हुए दिलों में नई जान आ गई | यह हवा उमंगों की हवा थी | बड़ा भारी जुलूस निकलना था | पर बादशाह का हुक्म था कि जुलूस न निकले | शहर में आतंक छा गया |
"बड़ा आया बादशाह ! क्यों न निकले जुलूस ? क्यों न निकले हमारा झंडा !" भाई ने बहन से कहा |
बहन बोली, "कौन है यह बादशाह ? "
भैया ने कहा, "ऊँह, होगा कोई !"
बहन ने पूछा, "क्यों न निकले जुलूस ? क्यों न निकले झंडा ? "
भाई कटु स्वर में बिला, "हमारा देश बादशाह का गुलाम जो है |"
उत्तर था - तब तो ज़रूर निकले जुलूस ! हम ज़रूर फहराएँगे अपना झंडा ! देखते हैं कौन रोकता है हमें !
झंडे की तैयारी होने लगी | बहन ने अपनी पुरानी ओढ़नी फाड़कर झंडा बना लिया | लाल-हरा रंग भी चढ़ गया | भाई ने उसे अपने खेलने के डंडे से बांध लिया | झंडा तैयार था |
अब भाई झंडा लेकर चला | "अरे भाई ! जाते कहाँ हो ? हम भी साथ चलेंगे, " बहन आग्रह से बोली |
"पर बहन, बड़ी दूर जाना है | तुम थक जाओगी |"
"नहीं भैया !"
"नहीं बहन !"
"जुलूस कौन बनाएगा ? तुम झंडा उठाना, हम जुलूस बनाकर चलेंगे पीछे-पीछे |"
"नहीं रानी, तुम जुलूस नहीं..., तुम एक काम करो | हमें रोली का तिलक लगाकर विदा करो जैसे राजकुमारी अपने भाई राजकुमार को विदा करती है |"
बहन ने खुशी की किलकारी के साथ ताली बजाई और दौड़कर, थोड़ी सी रोली, थोड़े से चावल सजा लायी | थाली में एक दिया भी जल रहा था | भाई की आरती उतारनी थी | मुँह के चारों तरफ़ घूमती थाली एक आभामंडल बनाने लगी | उसने देवी-देवताओं के चित्रों में भी वैसा ही आभामंडल देखा था | भाई के चारों तरफ़ वैसा ही आभामंडल देखकर वह बहुत खुश हुई |
बहन ने भाई के माथे पर तिलक लगाया, चावल बिखराए | तब भाई ने बहन के पैर छुए और विदा ली | बहन ने भाई के सिर पर हाथ फेरा और बलैयाँ लीं |
अब वह झंडा लेकर चला | बहन दरवाज़े पर खड़ी देखती रह गई | कहानियों की राजकुमारी इसी तरह विदा देती है | वह झंडे को लहराते हुए ले जाते भाई को दूर तक देखती रही |
कुछ दूर जाने पर बादशाह के सिपाहियों ने झंडेवाले को रोका वह न रुका | बादशाह के सिपहियों ने गोली चला दी | वह गिरा | झंडा न गिरा | वह उसके हाथ में था | गोली चलते देख कोई उसके पास न आया | बहन ने भाई को गिरते देखा, वह दौड़ पड़ी | भाई खून से लथपथ पड़ा था | वह पुकारती रही, "भैया ! भैया !"
भाई के प्राण मानो यह अमृतवाणी सुनकर लौट पड़े | वह बोला, "तू आ गई, यह झंडा ले |"
बहन ने झंडा थाम लिया | भाई चला गया | बहुत रोई, पर झंडा हाथ में उठाए रही | बादशाह के सिपाही मानों गढ़ जीत कर चले गए | लोग भागे आए | उन्होंने भाई की देह उठाई | आगे-आगे झंडा लिए बहन चलने लगी |
बादशाह का हुक्म था - 'जुलूस नहीं निकलेगा' | जुलूस निकला | 'झंडा नहीं निकलेगा' | झंडा निकला और बड़ी शान से निकला |
यह बालक था - गुलाब सिंह जो अपनी सुगंध बिखेरकर चला गया |
Conclusion : इस कहानी के द्वारा देशभक्ति, त्याग, बलिदान, भाई-बहन का प्रेम, प्रजा की ज़िम्मेदारियाँ, कर्तव्य आदि का चित्रण किया गया है | इस कहानी में 'झंडा' स्वतंत्रता के संकेत के रूप में दिखाया गया है |

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